रंजन : एक अभिनव दस्तावेज 【साक्षात्कार】
रंजन : एक अभिनव दस्तावेज अविनाश - सर्वप्रथम जानना चाहूँगा कि साहित्य की ओर रूझान कब और कैसे हुई? रंजन - सच कहूँ तो जिसे आप साहित्य कहते हैं, अपने बचपन में, उस पर मेरा रुझान कभी नहीं रहा। टीएनजे कॉलेजिएट स्कूल, नया बाजार, भागलपुर में जहाँ मैं पढ़ता था, वहीं स्कूल के समीप "भगवान पुस्तकालय" से पुस्तकें लेकर मैं पढ़ा करता था... लेकिन वे किताबें साहित्य की नहीं होती थी, अरबियन नाइट्स की कहानियाँ, तब मुझे बहुत प्रिय थी, चंद्रकांता संतति और भूतनाथ भी, मैंने तभी पढ़ी थी। यानि अपने बचपन में रहस्य और रोमांच की कहानियाँ ही पढ़ा करता था। बाद में मेरे प्रिय लेखक हो गए कुशवाहा कांत... एक-एक कर इनके सभी उपन्यास पढ़ गए। जब मैं मैट्रिक में था, मेरा रुझान जासूसी उपन्यास की तरफ़ हो गया, और मेरे प्रिय उपन्यासकार हो गए इब्ने सफी, वेद प्रकाश कंबोज और अकरम इलाहाबादी... अपने कॉलेज लाइफ तक मैंने इनकी किताबें पढ़ी। वह जमाना 1965ई. का था, मेरे ग्रेजुएशन का अंतिम वर्ष, जब हिंदी के जासूसी उपन्यास में एक टर्निंग प्वाइंट आया, जासूसी उपन्यास यथार्थवादी हो गया। इस टर्निंग प्वाइंट के प्रणेता थे, ओ...