*नव-सृजन प्रकाशन उद्देश्य के साथ एक सार्थक पहल*

आदरणीय/आदरणीया,

आप नव-सृजन प्रकाशन द्वारा पुस्तक प्रकाशन को उत्सुक हैं, यह हमारे और हिन्दी पाठकों के लिए हर्ष का विषय है। हमें विश्वास है कि आप जितना उत्सुक पुस्तक प्रकाशित करवाने के लिए हैं, उतना ही पाठकों तक पहुंचाने के लिए भी होंगे। विदित हो कि प्रकाशन निर्माण ही वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा साहित्य या सूचना को आमजनों के समक्ष प्रस्तुत करना है। प्रकाशन का शाब्दिक अर्थ ही है, 'प्रकाश में लाना।' इस संदर्भ से विलग होकर न तो स्वयं रचनाकार कहला सकते हैं और न ही साहित्य के शाब्दिक अर्थ 'सबों की हित' की बात पर न्याय कर सकते हैं। इस पहल के साथ नव-सृजन प्रकाशन आपकी रचनाओं को आमजनों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। बशर्ते आपकी भी सहभागिता हो। आप साहित्य सेवी होने के नाते स्वयं अवलोकन करें कि किसी भी रचनाओं को प्रकाशित करवाने का उद्देश्य क्या है? आखिर आप अपनी रचनाओं को प्रकाश में लाना क्यों चाहते हैं? कैसी जरूरत पड़ गई, जो दिन-रात समय को चुरा-चुराकर इसे तैयार किया? क्या प्रकाशन मात्र से आपकी रचनाएं जन-जन तक पहुंच बना लेगी? पुस्तक प्रकाशन से पूर्व रचनाकारों को भी इस पर आत्म-मंथन करने की आवश्यकता है। वरना, आप रूपये के बल पर पुस्तकें तो प्रकाशित करवा लेंगे, लेकिन उन पाठकों तक नहीं पहुंच पाएंगे, जिनके लिए रचते हैं। नव-सृजन प्रकाशन का प्रथम उद्देश्य है, पाठकों तक पहुंच बनाना, उनतक आसानी से किताबें पहुंचाना, जो आपके बिना संभव नहीं। आप पाएंगे, आज के दौर में नये रचनाकारों को छोड़ भी दें तो स्थापित माने जाने वाले लेखकों/कवियों को भी रूपये के बल पर रचनाएं प्रकाशित करवानी पड़ती है। यक्ष प्रश्न की भांति यह भी प्रश्न है, आखिर क्यों? बंधु! सीधी सी बात है, आपके पास पाठक नहीं हैं। आपने भी पाठकों तक पहुंचने का प्रयास नहीं किया। गाँव में रहते हुए शहरों की प्रेम कहानी को लिखना पसंद किया। वातानुकूलित कमरे में रहकर आदिवासी जीवन को उजागर करने की विफल कोशिश किया। आपने कल्पना को भी भोगा हुआ यथार्थ बताया। आखिर इस झूठ को पाठक क्यों कबूल करे? इन सारी बातों व समस्याओं के साथ नव-सृजन प्रकाशन के उत्साहित सदस्यों ने एक मुहिम के रूप में सामने आया है। हिन्दी साहित्य को उन पाठकों तक पहुंचाने का संकल्प लिया है, जिसके लिए आप रचते हैं। आप स्थिति-परिस्थिति को दरकिनार करते रहे तो निःसंदेह, निःशुल्क प्रकाशन की बातें भूल जाएं। दरअसल, आपको खुद पर भरोसा नहीं और न ही प्रकाशक को भरोसा देने में सक्षम हैं। परिणामस्वरूप रूपये देकर रचनाएं को प्रकाश में लाने की झूठी चाह बनाए हुए हैं। प्रकाशन के बाद कुछ दिए गये रूपयों के अनुसार प्रकाशक आपको प्रतियाँ मुहैया कराते हैं और आप उसे मुफ्त में कुछ लेखकों को, कुछ आलोचकों को तो कुछ कुछ विज्ञापन की लालसा में छोटी-बड़ी कंपनियों के पास प्रेषित कर देते हैं। हृदय से पूछें, क्या आपने इन्हीं लोगों के लिए लिखा या फिर उन पाठकों के लिए? इन सारी प्रक्रियाओं में पाठक पीछे रह जाते हैं। उनतक किताबें पहुंच नहीं पाती, जिसके लिये रचते हैं। बिना पाठक तक पहुंचे ही हम रचनाकार होने के ढ़ोंग से दबे जा रहे हैं। और जब कभी बातें आती हैं, तो ठीक उन नेताओं की भांति गिरगिटों की चाल चलते हैं, पाठक सर्वोपरि है, जैसा कि चुनाव के समय उसने कहा, जनता मालिक है!
इतना के बावजूद भी नव-सृजन प्रकाशन के युवा सदस्यों ने आपकी रचनाओं को मुफ्त में प्रकाशन का वीरा उठाया है, और इस प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पुस्तक प्रकाशित करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि जन-जन तक पहुंचायी जा सके। स्वाभाविक है, जहाँ पूँजी लगेगी, उसे प्राप्त करने के लिए एड़ी-चोटी मेहनत करनी ही पड़ेगी। सवाल होता है, आखिर एक रचनाकार के लिए प्रकाशक क्यों इतनी मेहनत करे? बिल्कुल उचित सवाल है। इसे पाटने के लिए आपका साथ होना बेहद जरूरी है। तब तो आपका लिखना और प्रकाशक के द्वारा प्रकाशित करना सार्थक होगा। न कि रूपयों के बल पर पुस्तक प्रकाशित करवा कर यूँ ही मुफ्त में बांट देना। आपने भी आज तक ऐसा ही किया। तब तो दर्जनों किताबें प्रकाशित करवा ली हैं और अपने जान-पहचान के दो-चार साहित्यकारों के बाद कोई पाठक नाम तक नहीं जान रहे हैं। रचनाकार बंधु! यह कटु सत्य है। इसे दरकिनार कर न तो आप साहित्यकार कहला सकते हैं और न ही साहित्य सेवी।
आप नव-सृजन प्रकाशन के साथ आएं और साहित्य सेवी बनकर अपने नाम को सार्थक करें। आपकी रचनाएं मुफ्त में प्रकाशित होंगी। आपके साथ मिलकर, दिशा-निर्देश का पालन करते हुए पाठकों तक पहुंचना प्रथम उद्देश्य है। आप तैयार हैं तो साहित्य है, वरना साधन से तो संपन्नता मिलती ही है।

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