कहानी

🌹चलती ट्रेन में दौड़ती औरत🌹

कुछ ही मिनट विलंब के कारण ट्रेन छूट गई। कानों तक आवाज आई, 'पीरपैंती जानेवाली लोकल ट्रेन पाँच नंबर प्लेटफार्म पर खड़ी है।' गणतव्य तक पहुँचने की नितांत आवश्यकता ने मतवाली गाड़ी तक दौड़ लगाने को कहा। हाँफते हुए उस डब्बे के करीब पहुँचा, जहाँ भीड़ कम दिखाई पड़ी। देखते ही आँखें झिलमिला गई, आदमी तो कम लेकिन बड़े गठ्ठर से लेकर छोटी बोड़िया की ढ़ेर लगी हुई थी।

किसी तरह डब्बे के अंदर प्रवेश किया। सीट पर तो दो-चार महिलाएँ ही बैठी हुई थीं, ज्योंही उसकी नजर मुझपर पड़ी कि सीट पर और पसर कर बैठ गयी। कुछ देर यूँ ही टुकूर-टुकूर देखता रहा, भला कोई मर्द रहे तब तो अपने हिस्से की बात कही जाए। मन में वेबकुफानी सोच भी उत्पन्न हुई, कहीं महिला बोगी में तो नहीं आ गया?

बैठी महिलाओं में से एक की आवाज आई, "बोल दो न, आगू बढ़ जाएगा, खड़ा-खड़ा टटुआय जाएगा।" उनमें में से एक ने खिलखिलाती हुई बोली, "आगू चल जाइये न, सीट खालिये है...।"

उसकी आवाज सुन मैं आगे बढ़ गया। वहाँ भी जस-के-तस। एक अधेर महिला ठिठोली में मग्न थी। मुझे देखते ही बोली, "कहाँ जाएगा, बैठ जाईये?"
थोड़ा-थोड़ा खिसक कर जगह बना दिया। मैं भी बैठ गया, वही टुकूर-टुकूर वाला स्टाईल में।

अगला स्टेशन कल्याणपुर जो भागलपुर से चार-पांच स्टेशन पहले, दो महिला आ धमकी। चाल-चलन, पहनावा-ओढ़ावा से थोड़ी पढ़ी-लिखी मालूम पड़ रही थी। हिम्मत नहीं हुआ कि बोल पाऊं बैठ जाईये । दोनों खड़ी-खड़ी बातें कर रही थी।

पास में बैठी महिलाओं में से एक बोली, "नरसिनिया होते, कहो आगू जाय ले...।"

दूसरी बोली, "अरे! नाय-नाय ! ई सब नेता के काम छैय, सब घसगरहनिया (घास काटने वाली) के हाथो में कलमो थमाये देलकैय आर ई सब देखैय नैय छो, एक कखनी (बांह) में बैगवा लटकाय के, ई डब्बा से ऊ डब्बा दौड़ा-दौड़ी करि रहल छैय ...।"
वे दोनों अनसुनी करती हुई आगे बढ़ती हुई ठीक बगल वाली सीट पर बैठ गई। कभी बुनाई की बात तो कभी सिलाई की....। विद्यालय के बच्चों की शिकायत ट्रेन पर करती रही।

साथ वाली महोदया चर्चा छेड़ी, "का बतायें दीदी, एक बार मैं बंबई गई थी, अपने मालिक के संग। वे पहले वहीं काम करते थे। समय पर रुपया-पैसा भी नहीं भेजते। मैं भी घरनी बन, आस लगाए ताकती रहती, कब डाक बाबू आवे? रुपैया-पैसा का टांट बना ही रहता था। आखिरकार सोची जब तक मरद को कसके नहीं पकड़ा जाए, तो छुट्टा घोड़ा बन जाएगा । गाँव-गिराम में भी सुनती आ रही थी, 'घौर से बाहर भेल तो देवो पितर से गेल।' सच में, परदेश में वे लोग बिगर जाते हैं। बात भी सही है। मैं उनके पास चली गई। वहाँ की हालात देखकर तो हँसी भी आती है और  घूटन भी कम नहीं।"

एक दिन उनके साथ बाजार घूमने निकली, देखकर तो मेरी आँखें चकरा गई। अधनंगी छोरी तो थी ही, मेरी माँ की उम्र की भी औरत आधे कपड़े में खुद को बेढ़ंग दिखा रही थी। मेरे पति उस ओर दिखाकर कहने लगे, 'देखो, यही है शहर। तुमलोग खामखाह बदनाम करती रहती हो,
देख रही हो न?'
मैं कुछ नहीं समझ पाई। झट से उनकी आँखों पर अपना हाथ रखकर बोली, "आप उधर मत देखिये।"

पास बैठी महिला ठहाके मार कर हँसती हुई बोली, "अरे! आप तो कमाल कर दिया, तब क्या हुआ?"
"आपको हँसी आती है? मेरा तो प्राण ही निकला जा रहा था। घर में तो वे कुछ समझते ही नहीं थे। डर के मारे कुछ बोल भी नहीं पाती थी। फिर भी हिम्मत करके बोली, 'आज के बाद इस रास्ते से नहीं गुजरेंगे।'
वे हकचका कर बोले, तब तो ठीक है। गंधारी की तरह आँखों पर पट्टी बांध दो, तुम आगे-आगे और मैं पीछे-पीछे चलता रहूँगा।"

अंदर ही अंदर मुस्काये जा रही थी, बगल वाली महिलाएं।
"दीदी, पल भर के लिए मैं भी उधेरबुन में विचरण करने लगी। भला मैं क्या करुँ? रास्ते भर चलती रही। जहाँ कहीं अधोवस्त्र का दर्शन होता, मैं उनकी आँखों पर हाथ रख देती। आगे बढ़ती गई। बंबईया चकाचौंध से लड़ती हुई, अपनी मरैया तक पहुँच गई, जहाँ ढेर सारे बच्चों की भीड़,  टुकड़े-पुरजे से बने बसेरा, जो क्षण भर में गाँव की याद ताजा कर दिया।"

"सरकार तो हम महिलाओं के लिए भगवान बन उतर आयी, न तो भला नौकरी मिलती? कितना पढ़ा-लिखा दिल्ली-ढ़ाका खाक छान रहा है। यहाँ भी लफुआ-लंगा बन चोरी-डकैती पर उतारु है, उससे तो हम भला हैं।"

साथी महिला बोली, "अभी कहाँ हैं, आपके ---?"
"अब भला मैं साथ छोड़ूँ। वह कठमर्दबा भी आशा में ही था, छोअन-भोजन साथ चले। मैं भी सोची सोने पे सोहागा। अब तो बस दिनभर घर के काम में इधर-उधर मंडराते रहता है। मैं अपनी डयूटी में मगन रहती हूँ।"

अचानक गाड़ी की सीटी बजी और आगे बढ़ गई। "चिल्लाई, लो दीदी! ऊ मरद के चक्कर में गाड़ी भी खुल गई। चिंतित स्वर में बुदबुदायी, "ट्रेन भी कोई गाड़ी है, ऑटो से आती तो रुकवा कर उतर भी जाती, इसे कौन कहने वाला?"

मेरे बगल में बैठी महिला ठहाके के साथ ताने मारी, "हम्मे कहलियो ने कि घसगरहनी, सब मास्टरनी बैन गेलैय- पढ़ल-लिखल रहैय तब तो, नामो पैढ़के उतैर जाये। औकरा से अच्छा हमसब छियै, अगला स्टेशन कोन अयतैय पता छैय....।"
मैं चुप-चाप सुनता जा रहा था।धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। डब्बे की यह हालात कि हर कोई चढ़ने वाले रिश्ते में बंधे हो, मानो एक दूसरे से पारिवारिक संबंध हो। कोई संकोच नहीं, आना और बैठ जाना। बातचीत भी जारी।

पसीने से तरबतर एक महिला आई, अपने गट्ठर को उपरी सीट पर फेंक कुछ बोलना चाही, तब तक में मैं थोड़ा खिसक गया। वह बैठ गई। तभी पहले से बैठी
महिला बोली, "आंय हे बरियारपुर वाली, सुनै छियो तोहर मर्दबा कारी माय संग फंसल छौ .....?"

उसने मैली कुचैली साड़ी का आंचल में ही पसीना पोछी और राहत की सांस ली। किसी तरह की सकुचाहट नहीं, न ही घृणा। उसने कहा, "आजो कल भतरा अपने के शेर समझी रहल छै।
बिलाय नियर घौर में बैठलो रहल और गुरकी देखायव में आगू। कनचुसकिया मशीनमा से फुसुर-फुसुर करैत रहल और घरनी पर इलजामो लगायत रहल...। कौन एयसन मरदौ होतैय जे घरौ में बैठलो रहतेय और ओकर मौग घौर-बाहर दोनों समहालतैय? हम त जंजालो में फंसी गैलोअ छिये, नै तो कवैय ऐसन मरदौ के छोयर के चैयल जैतिहिये रे ....। बचवा के मुंहो देखी के रही रहलिये....।"

उसने भी बिना संकोच किए पुरुषों पर प्रहार करना शुरु कर दिया...।
"बहिन ठीके कही रहल छो.... हमरो मरदौ कहि रहलो छैय, अकेलो-अकेलो हरदोम भागलोपुरोव जाय छो, कोय चकरो चलाय छो कि....?"

गाड़ी नाथनगर स्टेशन पहुँची। ट्रेन रूकते ही खाली होना शुरु। भागलपुर पहुँचते-पहुँचते गाड़ी पर इक्का-दुक्का ही सवारी बची रही।

भागलपुर से गाड़ी खुलते ही, भीड़ पहले की तरह हो चली। सभ्यता के चादर से ढ़ंके, पुरुषों से सभ्य दिख रही थी... महिलाएं । इशारे-इशारे में चार के जगह सात-आठ बैठ गये। कुछ बोलने में भी नहीं बन रहा था ....। सबके सब डेली पेसेन्जर मान गाड़ी को दखल कर रखी थी....।

हिम्मत जुटायी, कुछ बोलूं, पर मेरी बातों में कोई दम नहीं; आँखें फेर लेती, मेरी बातों से। मानो प्रत्येक पुरुष उसे मर्द ही दिखाई पड़ता हो। कुछ ही देर में सफेद कुर्ता-पैजामा वालों की भीड़ जमा होने लगी। पूरी गाड़ी को अपने कब्जे में कर लिया... चुनावी माहौल का दुर्दांत नतीजा। नेताजी फूलों से लदे, दोनों हाथ जोड़े बोले जा रहे, "हमू तोरे गाँव घौर के बेटा छियोव, एक बार धियान दै दिहौ- फेर ई कसम-कस से छुटकारा देलाना हम्मर काम छै - और तोरा सबके लाठी डंडा से पुलिसवा जे तंग करैय छौ, ऊ सबके अस्पताल देखलो ने, वहीं रहतैय।" नेताजी के पीछे कई समर्थक जो वोट नहीं मांग रहे थे, बल्कि गरीबी से जुझते हुए फटे-चिटे कपड़ो द्वारा निहारनेमात्र से धन्य-धान्य समझ रहा था। मानो, पालनहार आ गया हो। गाड़ी धीमी होती ही जिंदाबाद- जिंदाबाद नारोँ के साथ पटाक्षेप कर गये।

महिलाओं में कानाफुसी शुरु। अभद्र व्यवहार का जिक्र देहाती अंदाज में। उसकी बातों ने कानों में झनझनाहट पैदा कर दिया।
"भगवान का ही शुक्र है कि मैं बच गई, वरना न जाने क्या होता? कभी पुलिसवालों के गंदे हाथ, कभी कर्मचरियों के नपाक हाथ तो कभी स्थानीय गुंडों के द्वारा वर्षों से सतायी जा रही हूँ। फिर भी यह ट्रेन  साथ नहीं छोड़ती।"
उसी में से एक की आवाज निःसंकोच निकलने लगी,
"हमलोग तो इस लोहे की पट्टी को छोड़, कबके उतर जाती, यह भूख और उसकी (पति) अमानुषी सोच, खींच लाती है और अपने साथ निर्जीवता लिए चलने को मजबूर करती है।" महिला जैसी दिखने वाली की आवाज थी जो उम्र से 18-20 की होगी।

बीच में ही हिम्मत जुटाकर  मैंने कहा, "ईश्वर प्रत्येक जगह हैं, उनका ध्यान हरेक प्राणी पर समान भाव से है। अनाचारियों को सजा देना निहित कर्तव्य है।"

मेरी बातें सुन, बगल में बैठी महिला  मुस्कान बिखेरी।

मैंने सोचा शायद मेरी आस्तिकता पर हँसी आ गई होगी। चुप रह गया ।
"ईश्वर, वही भगवनमा का बात करते हो, जो चोर-गुंडों को भी घंटो तक शक्ति देता रहता है और हम भीड़-भरक्का में तड़पते रहते हैं!"
उसकी आवाज सुनते ही मैं सन्न रह गया।

बोली जा रही थी, "अरे! कहानी सुनती आ रही हूँ, द्रोपदी को कृष्ण ने बचाया था। उस अबला के पास बचा क्या, जब साड़ी से जमीन लद ही गयी। मैं नहीं मानती अत्थर-पत्थर को। मैं तो दो-दो हाथ करना जानती हूँ। उस गूंगे से कैसी उम्मीदें जो कुछ फूल-पत्तियों, लड्डु-बतासोँ की महक से व्यभिचारी को भी साथ दे?"

बातों-बातों में ट्रेन पीरपैंती स्टेशन पहुँचने वाली थी। मैंने हिम्मत को दुहराया और कहा, "बहन! वाकई आपलोग जज्बाती हैं। कठिन रास्तों को लांघने की पूर्ण क्षमता है, भारतीय नारी की प्रतिमान को स्थापित रखने की साहस है। आप सबों की जिन्दगी तप के समान है।"

दूसरी जो महिला मानी गई थी, पहनावा से।
शायद गरीबी और ग्रामीण संस्कृति ने उम्र से पहले ही माँ बनने के लिए मजबूर किया हो, उसने कहा, "नहीं! आप अभी सामर्थ्यहीन हो। मेरी  जिन्दगी तप नहीं बल्कि लाचारी को लीलने के लिए है, तप तो निःसहाय का ढ़ोंग है, दुर्बलता की परिचायक है। मैं ढ़ोंगी पर विश्वास नहीं करती। ट्रेन की रफ्तार से कहीं अधिक तेज मेरी जिन्दगी चलती है। 'चलती ट्रेन में दौड़ती औरत' का मिसाल हूँ।"
गाड़ी पीरपैंती स्टेशन पर रुकी, मैं धीरे-धीरे डब्बा से बाहर आ गया। कानों तक आवाज टकराई, "ऐसे सब मरदौ उपदेशो देते रहलौ छैय।"
जब तक ट्रेन खुल नहीं गई,  देखता रहा और हृदय से आवाज निकली- "सच में ट्रेन की रफ्तार धीमी और कानों से टकराई आवाज तेज.......।"

© संजय कुमार अविनाश
मो. 9570544102

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