हिन्दी पट्टी की दुर्दशा

अनायास धमकी सिंह का प्रवेश हुआ और उसने कहा, "यार! तू अविनाश बोल रहा है?"
"जी। मैं अविनाश।"
"तू क्या समझ रहा है?"
"मतलब?"
"गली-गली में कविता-कहानी पहुंचाने का मतलब क्या है?"
"कविता नहीं कहानी सर!"
"हाँ-हाँ, वही कहा।"
"तो सर! इसमें परेशानी किस बात की?"
"परेशानी? बाल सफेद कर लिया हूँ। बांटते-बांटते किताबें खत्म हो गयीं। कोई खरीदने वाला नहीं और तू काबिल बनता है। समाज को बिगाड़ने पर लगे हो। बच्चे कोर्स की किताबें पढ़ेंगे कि तुम्हारी कहानी-वहानी?"
"सर! बच्चे? समझा नहीं।"
"हाँ! बच्चे। पिछले सप्ताह से रट लगाया हुआ है, साठ रूपये, साठ रूपये। ये सब क्या है? इतनी किताबें अनाप-शनाप आती है कि दो पन्ने भी पढ़ी नहीं जाती और तुम मेरे घर में चूना लगाने चले हो। यह बिगाड़ना न हुआ तो क्या हुआ?"
"सर! मुझे तो मालूम नहीं। अब बच्चे समझे।"
"सुनो! जाएगा तो बोल दोगे, किताब बच्चों के लिए नहीं है। और ऐसे भी उसके पढ़ने से क्या होगा, मुझे दो प्रति दे दोगे, पढ़कर उसपर सार्थक समीक्षा लिख दूंगा। समीक्षा के साथ एक प्रति त्रैमासिक पत्रिका 'नया भाषा-भारती-संवाद' में भेज दूंगा। इससे तुम्हारा नाम होगा। तुम साहित्यकारों में जाने जाओगे। बच्चों से क्या मिलेगा?"
"जी। सर!"

टिप्पणियाँ