रंजन : एक अभिनव दस्तावेज 【साक्षात्कार】
रंजन : एक अभिनव दस्तावेज
रंजन - सच कहूँ तो जिसे आप साहित्य कहते हैं, अपने बचपन में, उस पर मेरा रुझान कभी नहीं रहा। टीएनजे कॉलेजिएट स्कूल, नया बाजार, भागलपुर में जहाँ मैं पढ़ता था, वहीं स्कूल के समीप "भगवान पुस्तकालय" से पुस्तकें लेकर मैं पढ़ा करता था... लेकिन वे किताबें साहित्य की नहीं होती थी, अरबियन नाइट्स की कहानियाँ, तब मुझे बहुत प्रिय थी, चंद्रकांता संतति और भूतनाथ भी, मैंने तभी पढ़ी थी। यानि अपने बचपन में रहस्य और रोमांच की कहानियाँ ही पढ़ा करता था। बाद में मेरे प्रिय लेखक हो गए कुशवाहा कांत... एक-एक कर इनके सभी उपन्यास पढ़ गए। जब मैं मैट्रिक में था, मेरा रुझान जासूसी उपन्यास की तरफ़ हो गया, और मेरे प्रिय उपन्यासकार हो गए इब्ने सफी, वेद प्रकाश कंबोज और अकरम इलाहाबादी... अपने कॉलेज लाइफ तक मैंने इनकी किताबें पढ़ी। वह जमाना 1965ई. का था, मेरे ग्रेजुएशन का अंतिम वर्ष, जब हिंदी के जासूसी उपन्यास में एक टर्निंग प्वाइंट आया, जासूसी उपन्यास यथार्थवादी हो गया। इस टर्निंग प्वाइंट के प्रणेता थे, ओम प्रकाश शर्मा... और मैं इनका दीवाना हो गया था। यह पहली बार हुआ कि उत्तर प्रदेश की साहित्य अकादमी ने इन्हें (एक जासूसी उपन्यास को लेकर) पुरस्कृत किया था।
कॉलेज के बाद तक मैं इन्हें नियमित रूप से पढ़ता रहा। इनकी मृत्यु के पश्चात एक नए जासूसी उपन्यास- कार सुरेंद्र मोहन पाठक ने मुझे बहुत प्रभावित किया, और मैं इनकी किताबें पढ़ने लगा। चूंकि हिंदी कथा साहित्य में जासूसी कथा लेखकों को कभी साहित्यकार नहीं माना गया, इसलिए कह सकते हैं कि कोर्स की किताबों के सिवा, मैंने तब तक कोई साहित्य नहीं पढ़ा। बाद के दिनों में मैंने इतिहास और दर्शन की पुस्तकें, कई वर्षों तक पढ़ी- महाभारत पढ़ी, विष्णु शर्मा रचित पंचतंत्र और गुणाढ्य को पढ़ा, लेकिन साहित्य की किताबों से वंचित रहा।
सच कहूँ तो साहित्यकारों के मध्य ही मैंने अपना होश संभाला। भागलपुर रेलवे स्टेशन चौक पर मेरी दादी का एक खपरैल मकान था, जिसमें एक ही कोठली थी... जिसमें मेरी दादी, मेरी माँ और परिवार के कई सदस्य रहते थे। जगह कम और लोग ज्यादा। इसी कारण मैं और मेरे पिता का निवास चित्रशाला ही था। तब वहाँ कार्यरत सभी कर्मचारी भी, हमारे साथ वहीं रहते थे। चित्रशाला की छत पर एक कमरा बना हुआ था, जिसमें बाहर से आए साहित्यकार ठहरा करते थे। इसी छत पर साहित्यकारों की गोष्ठी भी जमा करती थी। जिसे द्विजेंद्र गोष्ठी के नाम से सभी जानते थे। पंडित रामेश्वर झा द्विजेंद्र मेरे पिता के हिंदी शिक्षक रहे थे। गोष्ठी में सम्मिलित कई अन्य कवि भी टीएनजे कॉलेजिएट स्कूल में, इनके छात्र रह चुके थे।
आचार्य चतुरसेन शास्त्री का इस कमरे में कई महीनों का लंबा प्रवास रहा था... तब मैं बहुत बच्चा था और इन्हें जानता भी नहीं था। 'वयं रक्षामः' के प्रकाशन के लिए, ये भागलपुर आए थे। तब हिंदी साहित्य के प्रकाशन का मुख्य केंद्र बिहार ही था.. कालांतर में इलाहाबाद और फिर दिल्ली इसका केंद्र बन गया। भागलपुर का शारदा प्रेस, इनका प्रकाशक था। कार्य की अधिकता के कारण शारदा प्रेस के संचालक भगवती प्रसाद ड्रोलिया ने इनकी किताब का मुद्रण एलाइड प्रेस के जगदीश बाजोरिया से करवाया था। प्रसंगवश यह बता दूँ कि प्रकाशन के उपरांत जब कुछ हिंदू संगठन ने 'वयं रक्षामः' के लेखक और प्रकाशक पर कोर्ट में नालिश की, तब जगदीश बाजोरिया को भी इसमें लपेटा गया था। उन्होंने बहुत संभालकर मुकदमे के वे ऐतिहासिक कागजात आज तक रखा है।
तो मैं कह रहा था, तब मैं बहुत बच्चा था... लेकिन तब मेरी बाल बुद्धि में आचार्य जी कोई साहित्यकार नहीं, जन्म-कुंडली बनाने वाले एक पंडित थे। मैं तो साथ रहता ही था, और जो लोग अपने कुंडली दिखलाने उनके पास आते थे, उन सब को देखता था। एलाइड प्रेस से नित्य ही प्रूफ रीडिंग के लिए उनके पास लेटर, प्रेस का प्रूफ आता था, वे उसे देखकर प्रूफिंग करते थे और साथ-साथ अपने नए उपन्यास का लेखन भी करते थे। जो बाद में शारदा प्रेस से ही प्रकाशित हुआ... इसका नाम था "वैशाली की नगरवधू", लेकिन तब भी मेरी बाल चेतना में ये एक पंडित जी ही बने रहे। आज सोचता हूँ तो मुझे खुद पर हँसी भी आती है और अफसोस भी होता है कि मैं, कुछ और वर्ष पहले क्यों नहीं पैदा हुआ...?
लेकिन जब गोपाल सिंह 'नेपाली', फणीश्वर नाथ 'रेणु', और बनफूल जैसे लोगों के जमाने की बात है, तब तक मैंने होश संभाल लिया था... और दिनकर जी के समय तक तो कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था।
अविनाश - आप संस्कृति-पुरूष स्व. हरिलाल कुंज जी के पुत्र हैं। साहित्य विरासत में मिली है। उस समय फणीश्वरनाथ 'रेणु', गोपाल सिंह 'नेपाली', तथा रामधारी सिंह 'दिनकर' सरीखे बहु-चर्चित कलमकारों का पिताजी के साथ उठना-बैठना होता था। उस पल को किस प्रकार परिभाषित करेंगे?
रंजन- मेरे पिता हरि कुंज, चित्रशाला की स्थापना के पूर्व तक, एक पेशेवर रंगकर्मी थे और अपनी हिंदी 'जात्रा पार्टी' चलाते थे। चित्रशाला की स्थापना में उन्होंने अपने यूनिट के लोगों का भी ख्याल रखा। 'जात्रा पार्टी' के मैनेजर दीप नारायण सिंह, और शशिधर जैसे लोगों को चित्रशाला में ही रख लिया और बैजनाथ गुप्ता जैसे अनेक कलाकारों को, सहयोग देकर अलग-अलग व्यवसाय में लगा दिया। बाबू दीप नारायण सिंह उर्फ गुरुजी, वही थे जिन्होंने अंगिका में सबसे पहला उपन्यास 'जर लो दीया' लिखा। और 'जात्रा' में महिला पात्र निभाने वाले कलाकार बैजनाथ प्रसाद गुप्ता ही बाद में निर्मला प्रकाशन के मालिक बने। इसी प्रकाशन ने भागलपुर में हिंदी नाटकों का प्रकाशन, 1970ई. में शुरू किया, जिसका सूत्रधार स्वयं मैं था।
क्षमा करें, निर्मला नहीं, प्रकाशन का नाम उर्मिला प्रकाशन था। उर्मिला इनकी दूसरी पत्नी का नाम था। उर्मिला प्रकाशन अपने जमाने में हिंदी नाटकों का, देश में सबसे बड़ा प्रकाशन संस्थान बना... और इस प्रकाशन ने भागलपुर को दर्जनों की संख्या में नए नाटककार दिए, जिनमें प्रमुख थे, प्रभास चंद्र झा 'मतवाला' और पी.एन. जायसवाल।
बैजनाथ प्रसाद गुप्ता की दुकान, पिक्चर पैलेस वाली गली में थी, जहाँ रिलीज होने वाली फिल्मों के गाने की चोपड़ी वह खुद गा-गा कर बेचा करता था। जिक्र के काबिल बात यह है कि उस जमाने में इसकी चोपड़ी के लिए फिल्म का कथासार 'श्री रंजन सूर्य देव' जी खुद लिखा करते थे, जो बाद में पाली भाषा के ख्यात विद्वान हो गए।
जिक्र के काबिल दूसरी बात यह है कि सन्1970ई. में जब मैं इनसे नाटकों के प्रकाशन का व्यवसाय शुरू करने की बात की तब ये, अपनी पूंजी इसमें फंसाने के लिए तैयार नहीं थे... लेकिन मेरी जिद्द पर, बड़ी मुश्किल से इन्होंने मेरे रंगकर्मी मित्र 'मतवाला' का तब तक प्रसिद्ध हो चुका नाटक 'टुअर' छापा। अब फिर तो बाकी सब इतिहास है।
उर्मिला प्रकाशन ने सैकड़ों की संख्या में हिंदी नाटक प्रकाशित किया। देखते ही देखते बैजनाथ का बेटा भी बी.पी. राजेश के नाम से नाटक लेखक बन गया और अकेले इसकी 100 से अधिक नाटक प्रकाशित हो गया। इसी उर्मिला प्रकाशन ने मेरे पिता का एक नाटक 'चंगेज़ ख़ां' प्रकाशित किया और मेरा नाटक 'अरेंजमेंट' भी सन्1970ई. में इसी ने प्रकाशित किया।
नाटक शायद मेरे खून में था, अनुवांशिक था यह...इसीलिए तो सन्1959ई. में जब मैं टीएनजे स्कूल की तरफ से, एक होली-डे कैंप में, हजारीबाग में था, वहाँ मैंने खुद एक नाटक लिखकर, कैंप के कल्चरल कम्पीटिशन में स्टेज किया। तब मेरी उम्र 11वर्ष की थी। बाद में 60 के दशक में दुर्गा पूजा के अवसर पर, प्रत्येक वर्ष अपने नाटकों का ही मंचन किया करता रहा। मुझे नाटक में प्रकाश संयोजन का काम बहुत प्रिय था... इसलिए सन्1967ई. में जब डॉ. राधाकृष्ण सहाय ने भागलपुर में 'अभिनय भारती' की स्थापना की, तब मैं उनके साथ जुड़ा और 1970ई.में मंचित डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल का नाटक 'मिस्टर अभिमन्यु' का प्रकाश संयोजन खुद मैंने किया। आपके दूसरे प्रश्न का जवाब देना, गुजरे सपने से, दुबारा गुजरने जैसा है, क्योंकि उन दिनों की यादें, एक सपना ही है।
पिछली शताब्दी में जब मैंने होश संभाला, वह 50 का दशक था। तब का चित्रशाला सिर्फ साहित्य का नहीं, संस्कृति का केंद्र था। मेरे पिता जहाँ एक ओर चित्रशाला का संचालन कर रहे थे, वहीं लहेरी टोला चौक पर एक संगीतालय भी चला रहे थे, जिसमें वे नि:शुल्क संगीत की शिक्षा देते थे, साथ ही वे 'नवयुग-विद्यालय' में अ-वैतनिक संगीत के शिक्षक भी थे। उनकी एक संस्था 'गौरांग संकीर्तन समिति' के माध्यम से अध्यात्मिक चेतना का भी निरंतर संचार किया जा रहा था। इस प्रकार चित्रशाला में सिर्फ साहित्यकारों की ही नहीं, वरन कला, संगीत और अध्यात्मिक विभूतियों का भी समागम होता रहता था। तब भागलपुर की संस्कृति भी अलग थी... बंगाली टोला के 'जात्रा' में मेरे पिता अपनी 'बायोलीन' लिए संगत करते थे, और मैं उनके पास सारी रात बैठा रहता था। मेरे पिता बंगालियों के 'होरी दा' थे।
बांग्ला के सबसे बड़े गल्प-कार डॉ. बलाई चंद्र मुखर्जी 'बनफूल' ने मेरे पिता को अपना पुत्र ही मान लिया था। अजीब जमाना था वह, और अजीब लोग थे तब... शायर कौस एक गरीब मजदूर थे, मुफलिसी में जिए, मुफलिसी में मरे, लेकिन उनका कलम आज भी जिंदा है। चित्रशाला की 'द्विजेन्द्र गोष्ठी' में उन्हें खासतौर से बुलाया जाता था... तब हिंदी-उर्दू-बांग्ला की कोई सीमा-रेखा कहाँ थी...?
और इस स्वर्णिम संस्कृति का केंद्र चित्रशाला था। साहित्य, कला, अध्यात्म के साथ-साथ मेरे पिता नाटकों में भी समान रूप से सक्रिय थे। मुझे उनके द्वारा सन्1953ई. में मंचित नाटक 'कसाई' की आज भी याद है। इसके निर्देशक थे निर्मल सेन, सहायक थे कुतुबुद्दीन साहब और पर्दों के पेंटर थे श्याम आर्ट के सरदार जी... यानि बिहारी, बंगाली, मुस्लिम और पंजाबी.... शहर के सभी समुदाय का ऐसा सम्मिलन क्या आज संभव है?
यही थी हमारी तब की संस्कृति... उस जमाने के संस्मरण पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। इसे एक साक्षात्कार में समेटना संभव नहीं है अविनाश जी!
अविनाश - आपकी पहली रचना कब, कौन और कहाँ प्रकाशित हुई थी?
रंजन - प्रसंगवश बता चूका हूँ कि मैंने लिखना कब प्रारंभ किया था। लेकिन मेरी पहली प्रकाशित पुस्तक 'अरेंजमेंट' ही था, जिसे उर्मिला प्रकाशन ने सन्1970ई. में प्रकाशित किया था, यह एक नाटक था। इसके पूर्व सन्1967-71ई. के मध्य मैं एक सप्ताहिक अखबार 'डिफेक्टिव' निकाला करता था, जिसमें मेरा एक स्तंभ था - 'इसे रोकिए।'
इसी जमाने में भागलपुर से एक और सप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित होता था - 'बिहार जीवन', जिसके संपादक थे श्री रामदयाल पाण्डेय। अपने अखबार में उन्होंने, भागलपुर में प्रदर्शित किए जा रहे फिल्मों की समीक्षा का एक स्तंभ मुझे दिया था। उनके अखबार के लिए जिस पहली फिल्म की समीक्षा मैंने लिखी थी, वह फिल्म थे राजेंद्र कुमार की 'गोरा और काला।'
अविनाश - 'इसे रोकिए', यह स्तंभ किस संदर्भ में था? किसे रोकने की बात लिखा करते थे, साहित्य या राजनीति?
रंजन - यह कॉलम प्रत्येक उस संस्कृति विरुद्ध था, जो हमारी मानवता के विरुद्ध थी। चाहे वह विज्ञान का नया अविष्कार हो, या उप-संस्कृति का विष।
मेरे इस कॉलम में साहित्य भी था, संगीत और कला भी, विज्ञान भी और राजनीति भी।
अविनाश - चित्रशाला में आप बैठे रहते हैं। उसमें एक दरवाजा है, वह भी बंद रहती है, फिर शीशे के अंदर से बाहरी दुनिया भी देख लेते हैं, यह कौन-सी आँखें हैं?
रंजन - आपका यह सवाल अमूर्त है। कथाकार की आँखें तो उसका मन होता है, उसकी चेतना होती है। उसका जीवन अनुभव होता है, जो उसके आसपास की जिन्दगियों में घटित, घटनाओं में छिपी कहानियों को देख लेता है, जिसे आम लोग देख नहीं पाते।
चित्रशाला मेरा जीवन है, इसमें लगे शीशे की दीवार के अंदर और बाहर की दुनिया, मेरी पाठशाला है, जहाँ बैठकर, मित्रों से, अपनों और परायों से मिलते-बातें करते मैं रोज, कुछ-न-कुछ सीखता रहता हूँ।
अविनाश - आपकी रचनाधर्मिता, मित्रों में, आसपास के साहित्यकारों के साथ-साथ, दूर-दराज के कलमकारों में भी लोकप्रिय है। किंतु, आप चर्चा से दूर रहते हैं। आखिर चर्चा के बिना साहित्य का सदुपयोग कैसे मानेंगे? जबकि साहित्य सबों की हित की बात करती है।
रंजन - मुझे नहीं पता कि मेरी रचनाएँ कितनी लोकप्रिय हैं, अथवा है भी कि नहीं। रही मित्रों की बात, तो वे इसलिए भी मुझे और मेरी कहानियों को प्यार करते हैं, क्योंकि वह मेरे अपने हैं। सच कहूँ तो मैंने आज तक अपनी कोई भी कहानी या उपन्यास उतनी गंभीरता से नहीं लिखी, जितनी गंभीरता से लोग लिखते हैं।
जैसा कि सभी जानते हैं, मैंने एकांत में बैठकर कभी भी, कुछ नहीं लिखा। जो भी लिखा अपनी चित्रशाला में बैठे, मित्रों से बातचीत करते, एक ही बार में लिखा, ना उसकी दूसरी ड्राफ्टिंग की, ना किसी पैरा, किसी पंक्ति को बदला। और जब मैं ऐसा कह रहा हूँ, तो यकीन मानिए, मैं अपनी तारीफ नहीं, अपनी कमजोरी बयां कर रहा हूँ।
यह मेरी कमजोरी ही है कि दिल से एक बार जो लिख दिया, उसे अपने दिमाग से सुधारता नहीं, बदलता नहीं।
रही चर्चा में बने रहने की बात, तो यह सच है, रचना तभी तक मेरी अपनी रहती है, जब तक मैं उसे लिख रहा होता हूँ। लिख लेने के बाद तक भी वह मेरी होती है लेकिन, प्रकाशन के बाद वह पाठकों की संपत्ति हो जाती है। और जब वह मेरी रहती ही नहीं तो मैं उसके मोह से मुक्त हो जाता हूँ। मेरी नजर में चर्चित होने के सुख से बड़ा, रचना का सुख होता है, और इसलिए मैं अपनी रचनाओं की चर्चा से विमुख रहता हूँ।
मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन, किस तरह, मेरी रचना का आलोचना कर रहा है। मैंने जो कुछ लिखा, और जो कुछ भी लिखूँगा, उसकी उपयोगिता, आने वाला समय खुद कर लेगा, इसलिए भी मैं इन बातों से, चिंताओं से दूर रहता हूँ। और आप यह क्यों मानते हैं कि साहित्य की सार्थकता, उसकी चर्चा में निहित होती है?
साहित्य की सार्थकता, उसके पाठकों में निहित होती है अविनाश जी! आपके साहित्य को पाठक मिल रहा है, तो आप का साहित्य सार्थक है।
अविनाश - आप अंगिका के लिए भी समर्पित हैं। आपकी नजरों में हिन्दी भाषा के साथ बँटवारा नहीं है? या कहें इस परिपेक्ष्य में अंगिका कहाँ खड़ी है?
रंजन - आपका यह प्रश्न अंगिका के प्रति मेरी प्रतिबद्धता पर है... तो मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी की किसी भी लोक-भाषा के संरक्षण से हिंदी का कोई नुकसान नहीं होने वाला, वरन, इससे हमारी हिंदी और भी मजबूत होगी। हिंदी की यह पारंपरिक प्रवृत्ति रही है कि वह अपनी लोक-भाषाओं को, अपनी मानती रही है। आप हिंदी साहित्य का इतिहास देखें तो मेरी बात बिलकुल स्पष्ट हो जाएगी। हिंदी साहित्य का आदिकाल और भक्ति काल का आधार हमारी लोक-भाषाएँ ही रही हैं। सूर, कबीर और तुलसी का साहित्य क्या हमारा अपना साहित्य नहीं है, इन्हें ब्रज-भाषा और अवधी का साहित्य मान कर क्या हम अपनी हिंदी को अपंग कर दें?
हिंदी प्रदेश की लोक-भाषाएँ, हमारी हिंदी के वट-वृक्ष की जिंदा शाखाएँ हैं, और इनका संरक्षण वस्तुतः हिंदी का ही संरक्षण है।
हमारे बिहार में बोली जाने वाली अंगिका, बज्जिका, मगही, भोजपुरी सिर्फ हमारी लोक-भाषाएँ ही नहीं, हमारी अपनी संस्कृति भी है। अपनी संस्कृति को जीवित रखने का अर्थ, अपनी अस्मिता को जीवित रखना है, अपनी पहचान को जीवित रखना है। हिंदी हमारे आपसी व्यवहार की कामकाजी भाषा है, कामकाजी और मातृभाषा एक नहीं होती। हिंदी को अपनी लोक-भाषा से संघर्ष ना कर के, उसकी अपार शब्द-क्षमता को अपने शब्दकोश में सम्मिलित करते रहना चाहिए, यह उसे दुर्बल नहीं, और भी समृद्ध करेगी।
अब आपका यह प्रश्न भी आपके मूल प्रश्न में शामिल है कि आज अंगिका कहाँ खड़ी है?
इस विषय पर मेरा अपना जो विचार है, वह निश्चय ही हमारे अंगिका प्रेमी मित्रों को पसंद नहीं आने वाला है। मेरा मानना है कि अंगिका में सिर्फ साहित्य की रचना कर के ही हम अपनी अंगिका को सदा के लिए बचाए नहीं रख सकते। और ना ही, इस लोक-भाषा को, भारतीय भाषाओं की अष्टम सूची में दर्ज करवा देने से ही यह बचेगी... अंगिका तभी बचेगी, जब भोजपुरी बोलने वालों की तरह अंगिका भाषा-भाषियों की भी यह, अपनी भाषा बनी रहेगी।
हमें यह मान लेना चाहिए कि अंगिका को हमने अपने घर, परिवार में ही उपेक्षित करना शुरू कर दिया है। हमारे बच्चे ना तो हमसे अंगिका में बात करते हैं, और ना हम अपने बच्चों से। यहाँ तक कि दो अंगिका-भाषी जब कभी आपस में मिलते हैं तो वे खड़ी बोली में बात करते हैं, अंगिका में नहीं। आप भोजपुरी क्षेत्र में जा कर देखिए, वे आपस में किस भाषा में बात करते हैं। उन्हें भोजपुरी भाषा-भाषी अपने लगते हैं, इसलिए वे जब भी, जहाँ कहीं मिलते हैं, बेहद अपनेपन के साथ, अपनी बोली, अपनी भाषा में बात करते हैं, और भोजपुरी बोलकर खुश हो जाते हैं। ठीक यही बात मैथिली भाषा-भाषियों के भी साथ है।
संसार भर में कई भाषाएँ, रोज-रोज लुप्त होती जा रही हैं, क्योंकि इनके बोलने वालों की संख्या घटती जा रही है। जिन भाषाओं के बोलने वालों की संख्या, जिस तेजी से घटती जाती है, वे भाषाएँ उतनी ही तेजी से मरती जाती है।
तो क्या हमारी अंगिका भी एक दिन मर जाएगी?
इस प्रश्न का उत्तर अंगिका के आंदोलन कर्ताओं के पास नहीं, अंगिका के साहित्यकारों के पास भी नहीं, इसका उत्तर सिर्फ उनके पास है, जिनकी यह अपनी मातृ-भाषा है।
अविनाश - आप हमेशा अनुभवजन्य लेखन को प्रथम स्थान देते आ रहे हैं। आपके उपन्यास 'अगिनदेहा' में पढ़ा हूँ, एक पात्र श्रीवास्तव, अन्यान्य बीमारियों से ग्रसित होने के बावजूद भी शराब पीते हैं, शराब से परहेज़ नहीं करते, तो वहीं एक कहानी में आप के पात्र उच्च रक्तचाप से ग्रसित है, फिर भी शराब में रक्तचाप कम करनेवाली दवा मिलाकर पीता है। साहित्य के माध्यम से यह कैसा संदेश दे रहे हैं?
रंजन - लेखन का रिश्ता अनुभव से ज्यादा, जीवन पर आप की पकड़ से है, जिसमें आपका अपना जीवन- अनुभव भी बेशक बहुत काम आता है। जीवन पर पकड़ से मेरा आशय एक कथाकार की संवेदना से है। दूसरों की वेदना को महसूसने की क्षमता, जितनी एक कथाकार के पास होती है, उतनी प्रायः दूसरों के पास नहीं होती। यही कारण है कि अपने पात्रों की चेतना में उसका परकाया प्रवेश हो जाता है। वह अपने पात्रों की धड़कनों को महसूसने लगता है, इसलिए मैंने कहा, कथाकार को अपने अनुभव से ज्यादा, उसकी संवेदी दृष्टि काम आती है।
इसी प्रश्न के साथ आपने मेरी कहानियों के नेगेटिव चरित्रों की बात की है, कई बीमारियों से ग्रसित मेरे एक पात्र श्रीवास्तव की बात की है, जो शराब पीता है। श्रीवास्तव का पात्र 76 वर्षीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त, आधुनिक जीवन-शैली का एक अमीर और रंगीन बूढा है। ऐसा चरित्र, आपकी नज़र में शराब नहीं तो क्या लस्सी/शरबत पीएगा?
पात्रानुसार यदि आपने पात्र का चरित्र चित्रण नहीं किया तो यह क्या, आपके साहित्य सृजन के प्रति बेईमानी नहीं कहलाएगा? उसे आप मंदिर में बैठा हुआ, भजन करते हुए दिखा सकते हैं?
नहीं दिखा सकते... आप जब कोई उपन्यास लिखना शुरू करते हैं, तो आपसे आप के पात्र का उतना परिचय नहीं रहता है। कथानक के विकास के साथ-साथ, आप के पात्र का चरित्र भी विकसित होते जाता है, और जल्द ही वह पात्र, जिसकी रचना खुद आप ने ही की थी, आपके हाथ से बाहर होने लगता है, वह वही करने लगता है, जो उसे करना चाहिए।
और जनाब अविनाश जी, मेरा यह पात्र, एक ऐसा कैरेक्टर है, जिसके जीवन का अपना नशा खत्म हो चुका है, और आप यकीन मानिए, बाहर का नशा वही करता है, जिसके जीवन का अपना नशा खत्म हो चुका होता है। और कथा साहित्य का अर्थ ही है जीवन की पुनर्रचना... जीवन जैसा है, वैसा ही तो लिखेंगे आप?
साहित्य संवेदना को जागृत करने का काम करता है। पाठकों के हृदय में छुपे देवत्व को संवेदित कर दीजिए, इतना ही काफी है। आपके लेखन इतने से ही सार्थक हो जाता है। आदर्शवादी कहानी किसी को सुधार नहीं सकता। आप अपनी कहानियों से सिर्फ अपने पाठकों को संबोधित कर दें, बस!
अविनाश - आप घोर विपत्तियों के साथ तालमेल बिठाने में अव्वल रहे हैं, जैसा की अबतक में, मैं समझा हूँ। क्या कोई ऐसी कहानी है, जिसमें पत्नी रीता का जिक्र हुआ हो?
रंजन - आपका यह सवाल बेहद खतरनाक है। मैंने अपनी किसी भी कहानी में अपनी स्वर्गीय जीवन-संगिनी रीता को, अपना पात्र नहीं बनाया... क्योंकि उन स्मृतियों को, पलों को फिर से जीने की कूवत मुझमें नहीं है। इसे मैं सार्वजनिक रूप में कॉन्फेंस करने के लिए तैयार हूँ।
मैंने अपनी पत्नी के पूर्व, अपनी एक मात्र संतान को खोया, बाद में अपने पिता को, और अंततः अपनी पत्नी को....। इन सभी की कहानियाँ लिखना क्या संभव है मेरे लिए...? जब आप का जवाब देते हुए मैं थरथरा रहा हूँ तो फिर उनकी कहानियाँ कैसे लिख सकूँगा मैं?
नहीं अविनाश जी, यह मुझसे संभव नहीं है।
अविनाश - आपकी रचनाधर्मिता का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, अंग-महाजनपद में बिखरी लोक-गाथाओं को औपन्यासिक रूप में ढ़ालने एवं अनेकों को प्रेरित करके, उनसे उपन्यास लिखवाने का... जबकि आप भलीभांति जानते हैं, सलाह से रचना, नहीं रची जाती, बल्कि रची जाती है, अनुभव और पात्रों के द्वारा झकझोरे जाने पर। आप क्या कहेंगे?
रंजन - अंग देश में बिखरी हुई लोक-गाथाओं का संकलन करके, उन पर आधारित उपन्यास की श्रृंखला का प्रकाशन सच में मेरे जीवन की एक ऐतिहासिक घटना है।
वह एक जुनून था, एक सपना था, जिसे मेरे साहित्यकार मित्रों ने पूरा किया, और आपको जानकर यह खुशी होगी कि, एक सीमित अवधि में, अंग देश की लोकगाथाओं पर आधारित 21 उपन्यासों का प्रकाशन हो गया... विश्व लोक-साहित्य में, आज तक ऐसा कोई सामूहिक प्रयास पहले कभी नहीं किया गया। आपका यह कहना है कि रचनाएँ किसी की सलाह पर नहीं लिखी जाती... बिल्कुल सच है, वह लिखी या रची जाती है अभिव्यक्ति की व्याकुलता पर। परंतु, अविनाश जी, मेरे इस सार्थक प्रयोग की कहानी बिल्कुल अलग थी। हमें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं करनी थी, बल्कि कथात्मक गीतों को गद्य में परिवर्तित करना था। यह एक सामूहिक प्रोजेक्ट था। प्रथम तो लोक कंठों से सुनकर, रिकॉर्ड करके, उसे लिखना, उसकी टूटी कड़ियों को जोड़ना, सभी गाथाओं के कालखंड को निर्धारित करना, फिर उन सभी पर उपन्यास का लेखन करवाना, कंपोज करवाना, प्रूफिंग करवाकर, पब्लिशर से पब्लिश करवाना। आप समझ सकते हैं, यह कितना बड़ा यज्ञ था। कंप्यूटर, प्रिंटर और टाइपिस्ट मेरे पास था ही... लेकिन भागलपुर में उपन्यासकार नहीं थे, समस्या थी, लिखेगा कौन?
हमारे यहाँ कवियों की तो कमी नहीं थी, लेकिन कथाकार बहुत कम। मैंने जब अपने सीनियर कथाकारों से बात की तो उन्होंने कोई रुचि प्रदर्शित नहीं की, ना देवेंद्र सिंह ने स्वीकारा, ना पी.एन जायसवाल ने हामी भरी। शिव कुमार शिव ने भी प्रारंभ में अपनी रुचि नहीं दिखाई... यानी भागलपुर के तीनों स्थापित कथाकारों ने, विभिन्न कारणों से मुझे सहयोग नहीं किया।
मेरे सभी साहित्यकार मित्रों में उत्साह तो बहुत था, लेकिन कथा लेखन तो कथाकार ही कर सकते थे, और कथाकार भी ऐसा, जिसके पास उपन्यास लेखन का शिल्प हो।
मेरे सामने चुनौती यह नहीं थी कि अपने आग्रह पर किसी से उपन्यास कैसे लिखवाऊँ, चुनौती यह थी अविनाश जी, कि जिसने कभी कोई उपन्यास नहीं लिखा, उनसे उपन्यास कैसे लिखवाऊँ... और असल कमाल की बात यह थी, कि आखिर मैंने ऐसे लोगों से लिखवा लिया, जिन्होंने कभी कोई उपन्यास नहीं लिखा था।
डॉ. प्रतिभा राजहंस को यह यकीन ही नहीं था कि वे उपन्यास भी लिख सकती हैं, लेकिन लोगों के आत्मविश्वास को जगाना, उन्हें उत्साहित करना, उनकी छुपी खूबियों का बयां करके उन्हें यकीन दिला देना कि वे लिख सकती हैं, एक कला है... और मेरे अंदर यह कला है।
मैंने अपनी इसी कला का उपयोग करके भागलपुर के पुरुष और महिला लेखिकाओं की एक टीम तैयार की, उन्हें गाइड करता रहा, उनके लिखे को टाइप करवाते हुए, उनसे विचार-विमर्श करता रहा, और प्रोजेक्ट चलता रहा।
मेरे इस अभियान में कुछ अनुभवी लेखक और लेखिकाएँ भी शामिल थे, जिन्हें दैनिक टेलीफोनिक कांटेक्ट में रखना पड़ा, और कुछ ऐसे थे जिन्हें गद्य में, पूरे नावेल का दृश्य-बंध बनाकर देना पड़ा। उनके साथ नित्य की बैठकी करनी पड़ी... और जैसे-तैसे तैयार करके यह सिलसिला चलाते रहना पड़ा।
कुछ अनुभवी लेखकों से काल-खंड संबंधी भूलें भी होती रही। ऐतिहासिक काल-खंड में उनके पात्र चाय पीने लगे थे, जब कोयला का खान ही नहीं था, तब भी कुछ मित्रों की कथा में कोयला खान का जिक्र हो गया। हमारी एडिटोरियल निगाह इन्हें देखती, दुरूस्त करती, रचनाकारों को समझाती और सिलसिला कायम रहता। कुछ लोगों को साथ लेकर चला यह कारवां ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया, नए मित्र भी इसमें शामिल होते गए, पत्रकार पीयूष मित्र भी आए... और इस प्रकार 21 उपन्यासों के प्रकाशन के साथ पूर्ण हुआ।
अविनाश - आप पेशे से फोटोग्राफर मानते हैं, हैं भी। एक फोटोग्राफर को पता होता है कि किसी चेहरे की खूबसूरती किस ऐंगल से झलक सकती है, तो आपकी रचनाओं में केमरे का साथ होना जरूरी है?
रंजन - आपका यह प्रश्न वाकई टेक्निकल है, और मेरी रचना प्रक्रिया से संबंध है। मैं मानता हूँ कि एक ऐसे कथाकार को, जो कहानियाँ सुनाता नहीं, उसे घटित होते हुए, दृश्य-बाय-दृश्य दिखाता चलता है, सिर्फ एक फोटोग्राफर ही नहीं, सिनेमैटोग्राफर बनना पड़ता है। एक ऐसा सिनेमैटोग्राफर जिसके सामने कोई दृश्य होता ही नहीं, वह तमाम दृश्य उसकी चेतना में लिखते समय फ्रेम बाय फ्रेम चलता रहता है। मैं जब भी कोई दृश्य लिखता हूँ तो मेरी चेतना में, लिखने के पूर्व, वह दृश्य सजीव हो जाता है। मैं उसे देखते हुए लिखता हूँ, पात्रों को बोलते हुए सुनता हूँ, और उनके सुने हुए संवादों को लिख देता हूँ। कहानियाँ या उपन्यास की मेरी रचना-प्रक्रिया वैसी ही होती है, जैसे की एक फिल्म स्क्रिप्ट के लेखक की होती है। वह भी लिखते हुए, फिल्माए जाने वाले दृश्यों को, अपनी चेतना में देखते हुए लिखता जाता है।
अविनाश - आपका जीवन-वृत्तांत भी अजीब है। जब आप 15-16 वर्ष के थे, तब आप 10लड़कों का क्लब बनाया, जिसका नाम 'यू-टेन' दिया। फिर कुछ वर्षों बाद ऑर्केस्ट्रा का नाम 'टीन्स हारमोनिका' दिया, फिर 'स्टार्स हारमोनिका' और अंत में 'स्टारनिका।'
आखिर ऐसा क्यों? और आज उस ऑर्केस्ट्रा तथा उन सहयोगियों को किस मुकाम पर देख रहे हैं?
रंजन - 'यू-टेन' का अर्थ था 'यूनाइटेड-टेन', यह मेरे हिंदू- मुस्लिम और मेरे बंगाली दोस्तों का एक ग्रुप था। जो मैंने भागलपुर के मुस्लिम इलाका ततारपुर में बनाया था। इसके पहले भी मैंने यहीं एक 'फ्रेंड्स लाइब्रेरी' बनाई थी। बाद के सालों में मैंने अपने शहर का पहला, गैर-पेशेवर आर्केस्ट्रा बनाया। चूंकि हम सब तब टीनएजर्स (बीस वर्ष से कम आयु वर्ग के) थे, इसलिए मैंने इसका नाम रखा था, 'टीन्स हारमोनिका'। ऑर्केस्ट्रा चलता रहा, हमारे कार्यक्रम होते रहे और हमारी उम्र भी बढ़ती रही। जब हम सभी 19 की उम्र को पार करने लगे, तब मैंने 'टीन्स-हारमोनिका' को 'स्टार्स हारमोनिका' कर दिया, बाद में यही ऑर्केस्ट्रा 'स्टारनिका' के नाम से जाना गया।
'स्टारनिका' के एक स्टार प्रदीप सिन्हा आज मुंबई के सफल बिजनेसमैन हैं, और उनका पुत्र जाना-पहचाना टीवी स्टार बन चुका है।
अनिल कपूर, हमारा दूसरा स्टार अब नयी दिल्ली में है, उसका दो पुत्र ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर के बिग-बिजनेस टिकून (Tykoon) हैं। मेरा दोस्त ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में रहकर, बर्डस फोटोग्राफी का एक बड़ा जाना पहचाना नाम हो गया है।
'स्टारनिका' का हमारा सिंगर मोहम्मद कय्यूम अहमद फिल्मों का प्लेबैक सिंगर बन गया, और हमारा दूसरा गायक रजला शर्मा, इंडस्ट्री का म्यूजिक कंपोजर बना, उसने अपने निर्देशन में लता जी तक को गवाया। अब यहीं भागलपुर में रहकर, आज के युवा को मुफ्त संगीत की शिक्षा दे रहा है। इसी तरह बाकी के सितारे भी अपनी-अपनी गृहस्थी में फंसे जीवन बिता रहे हैं, और सुरेंद्र सिंह कालरा जैसे, कुछ ऐसे भी दोस्त हैं जो स्मृति बन चुके हैं।
अविनाश - आपको केंद्र में रखकर एक किताब लिखी गई है, 'आइने बोलते हैं', उस पुस्तक में आपके किसी मित्र ने लिखा कि रंजन योगी-योगिनियों से मिल चुका है। आप स्वयं योगी और योगिनियों के संदर्भ में बताएँ।
रंजन - यह सच है, मैं अपने जीवन में कई सिद्ध लोगों से मिला, संपर्क में रहा... जिनकी स्मृतियाँ आज भी मुझे रोमांचित करती रहती है। तंत्र और योग मेरा प्रिय विषय रहा है। जिन परा-विद्या को कुछ लोग तमाशा कहते हैं, मुझे खुशी होती है कि मैंने इस तमाशा को घुसकर देखा है। लेकिन इस साक्षात्कार में उनके विषय में बताना उचित नहीं है।
अविनाश - आपकी रचनाओं में एक 'कुंवर नटुआ दयाल' चर्चित कृतियों में से एक है। जपानी भाषा में भी अनुदित है। तंत्र विद्या को आधार मानकर दयाल और बहुरा की कथा जगजाहिर है। आप तंत्र-मंत्र पर विश्वास करते हैं? हाँ, तो आप अपने अनुभव को साझा करें।
रंजन - आपका यह प्रश्न भी पिछले प्रश्न की तरह ही है। 'कुंवर नटुआ दयाल' में मैंने तंत्र को बिल्कुल सरल तरीके से समझाया है। मेरी इस कृति को पढ़ने के बाद भी यदि आप, तंत्र के प्रति मेरी आस्था पर प्रश्न करते हैं, तो मैं सिवा मुस्कुराने के और क्या कर सकता हूँ। मैंने ऐसे लोगों को देखा है, जो तंत्र-मंत्र को अंधविश्वास कहते हैं, और मुसीबत में वही लोग पंडित जी से अपने लिए महा-मृत्युंजय का जाप करवाते हैं। इसलिए मैं इन चीजों पर यकीन करने की कोई वकालत नहीं करता... जो जानते हैं, वे मानते हैं- जो जानते नहीं, वे मानते नहीं। वैसे धोखा भी आज एक व्यवसाय है, ठगी भी एक कला है। और ऐसे व्यवसायी और कलाकारों की कोई कमी भी नहीं है, बल्कि असली से कहीं ज्यादा संख्या आज नकली का है। इससे विशेष इस संदर्भ में और कुछ नहीं कहना चाहता।
अविनाश - आपके उपन्यास 'कुंवर नटुआ दयाल' को लेकर डॉ. तपेश्वर नाथ ने आलोचना की, कि "नैसर्गिकता की जगह कृत्रिमता ने ली है। शास्त्रीय चिंतन क्रम में, दार्शनिक स्थलों पर, आत्मा की मुक्ति और प्रकृति की आत्मा या परासत्ता पर वरीयता-प्रदर्शन ग्रथांत में अंतर्विरोध बन गया है (पृष्ठ संख्या 363-64)। अनावश्यक दार्शनिक गुत्थी बढ़ गई है। फलतः कथा प्रवाह बोझिल हुआ है। भुवन मोहिनी शरत के उपन्यास की विदुषी का दूर तक रूपांतरण है, जिसमें 'पथेर दाबी' की प्रखर नायिका की भी परछाई है।" इस संदर्भ में आप क्या कहेंगे?
रंजन - यह प्रश्न आपने बहुत अच्छा किया है। तपेश्वर नाथ जी, भक्ति साहित्य के अधिकारी विद्वान हैं, और उन्होंने मेरी किताब को पढ़ा, आलोचना की, इसलिए मैं उनका आभारी हूँ।
जिस प्रसंग में उन्होंने अंतर्विरोध की बात कही है, वह प्रसंग, प्रकृति और पुरूष का है। प्रकृति और पुरूष की प्रथम व्याख्या भुवन मोहिनी ने की और अंत में कुंवर नटुआ दयाल ने, इसे अपनी तरफ से स्पष्ट किया है। पात्र अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार एक ही विषय की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, और जिस विरोधाभास का जिक्र विद्वान समीक्षक ने किया है, उन्हें समझना चाहिये था, कि विरोधाभास में लेखक की अपनी भूमिका कहीं नहीं है, ये पात्रों के अपने-अपने विचार हैं।
वैसे विद्वान आलोचक यदि उस प्रसंग को पुनः पढ़ेंगे तो उन्हें संतोष हो जाएगा।
कथानक का विषय ही बेहद क्लिष्ट है, तंत्र-मंत्र विषयक कथानक यदि कहीं, कथा प्रवाह को अवरोधित करता है, तो यह मेरी लेखकीय मजबूरी है। तंत्र के केनवास को बनाये रखना और कथा को इस बोझ के साथ सरलता से प्रवाहित करते रहना, मेरे लिए संभव ही नहीं था। रही बात नैसर्गिकता को कृत्रिम करने वाली बात, तो इसे सच कहूँ तो मैं समझा ही नहीं, कि वे कहना क्या चाहते हैं।
शरत के जिस उपन्यास 'पथेर दाबी' की, और उसकी नायिका की उन्होंने चर्चा की है, उसे मैंने पढ़ा नहीं, इसलिए उनकी इस बात का मैं उत्तर नहीं दे सकता।
अविनाश - एक बार पिताजी की बैठकी में कई साहित्यकार बैठे हुए थे। इस बैठकी में गोपाल सिंह नेपाली जी भी थे। उस दिन राजकपूर और वैजयंतीमाला अभिनित फिल्म भागलपुर के सिनेमाघर में लगी थी। आपने जिद्द मचा दिया फिल्म देखने के लिए, आपको साथ लेकर गोपाल सिंह नेपाली फिल्म दिखाने ले गये। फिल्म देखने के उपरांत आप पुनः जिद्द मचाने लगे कि मैं विवाह वैजयंतीमाला के साथ ही करूँगा।
बच्चा जो ठान लेता है, वह कर गुजरता है। विवाह तो संभव नहीं, लेकिन मुंबई प्रवास के दौरान कभी आपने वैजयंतीमाला से मिलने की कोशिश की?
रंजन - नहीं। मैं वैजयंतीमाला जी से कभी नहीं मिला। यह बात मेरे बचपन की थी, जो बाद में आई-गई हो गई।
अविनाश - आप सरस्वती पुत्री, कोकिल स्वर लता मंगेशकर जी के प्रशंसक हैं। दीदी से भी संबोधित करते हैं। उनसे जुड़ी यादों को जानना चाहूँगा।
रंजन - लता जी के साथ का मेरा संस्मरण प्रकाशित है, आप चाहें तो उसे यहाँ शामिल कर सकते हैं।
अविनाश - सन्1973-74ई. की बात है, तब आप मुंबई में रहते थे। आपका इरादा वीडियो पोस्ट प्रोडक्शन का था। इस कार्य के तकनीकी ज्ञान हेतु आपने जर्मनी गया। स्वीटजरलैंड, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड्स, सिंगापुर और मलेशिया जैसे शहरों का भ्रमण किया। आपने बताया भी कि मेरे अधिकांश मित्र ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में रहते हैं, फिर आपने भागलपुर में ऐसा क्या देखा, जिसे आज भी पकड़े हुए हैं?
रंजन - आप मेरी गुजरी जिंदगी की कई बातें जानते हैं, तो यह भी जानते होंगे कि अपने पाँच भाइयों और चार बहनों में सबसे बड़ा हूँ। फिर यह भी जानते होंगे कि परिवार में ज्येष्ठ की जिम्मेदारी क्या होती है। उसे अपने परिवार के लिए, अपनी इच्छा/अपेक्षा से, हर पल कितना समझौता करना पड़ता है। मैंने अपनी दो बहनों और तीन भाइयों की शादी, पिता बनकर की, अपनी संयुक्त परिवार की सारी जिम्मेदारी खुद संभाली, क्योंकि मेरे पिता अपने 61वें वर्ष की आयु में ही हमें छोड़ गए थे।
अविनाश - दिल्ली में आप को सम्मानित करते हुए राजेंद्र यादव जी ने कहा था, "जब किसी को सम्मानित किया जाता है, तब एक ज्योति उपजती है। ज्योति जो खुद उसकी अपनी है, ज्योति जो खुद उसके प्राणों में छिपी होती है; ज्योति जो जाग उठी है।"
उपर्युक्त पंक्ति को परिभाषित करने के साथ यह भी बताएं कि किस रचना के लिए सम्मानित हुए थे?
रंजन - आपकी बात का जवाब देने का अर्थ है, खुद को प्रचारित करना।
आपने मेरे विषय में इतनी जानकारी जुटा ली है तो यह भी जानते ही होंगे कि मैं प्रचार से दूर रहने वाला व्यक्ति हूँ, इतनी दूर कि, खुद को कभी साहित्यकार के रूप में मानता ही नहीं।
अविनाश - आप सोशल साइट्स पर भी सक्रिय हैं, आज के संदर्भ में इसकी भूमिका को किस रूप में देखते हैं?
रंजन - हमारी आज की जिंदगी में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा रोल है। हम ना केवल पूरी दुनिया के संपर्क में आ गए हैं, बल्कि अपनी बात, अपने विचारों को, एक बटन दबाकर ही अभिव्यक्त कर सकते हैं, प्रसारित कर सकते हैं। विश्व भर में फैले अपने मित्रों, परिजनों के संपर्क में रह सकते हैं, अपनी स्थिति से सबको अवगत रख सकते हैं, सब की कुशलता जान सकते हैं।
फिर भी कुछ लोग जहाँ इसे वरदान मानते हैं, वहीं कुछ इसे अभिशाप समझते हैं... क्योंकि आज के युवा इसकी गिरफ्त में हैं और इसकी लत में पड़कर अवसाद के शिकार हो रहे हैं। कुछ लोग अपनी कुंठे निकाल रहे हैं, कुछ अपनी भड़ास। कुछ लोग खुद को प्रचारित करने में लगे हैं, कुछ लोग शेयर और लाइक के पीछे पागल हैं।
आज का सोशल मीडिया एक ऐसा चाकू बन गया है, जिससे सब्जी भी काट सकते हैं और किसी का गला भी काट सकते हैं। साईंस का यह वरदान आपके हाथ में है, इसलिए इसका सदुपयोग या दुरूपयोग भी आपके ही पास है।
अविनाश - आप के विषय में अक्सर सुनता ही नहीं, बल्कि स्वयं सुन चुका हूँ, समझ चुका हूँ कि, आप किसी की रचना को फूल-मालाओं से उस कृति व कृतिकार को संवारने में कोताही बरतते हैं। प्रायः उसकी खामियों को सामने लाते हैं। अर्थात रंजन बेबाक है। स्पष्ट करें।
रंजन - यह तो उचित ही है... लेकिन मैं दिल तोड़ने वाली बात नहीं करता, रचनाकारों को कभी हतोत्साहित नहीं करता, उन्हें खारिज नहीं करता। रचना की कमियों को बता कर, उसे ठीक करवाता हूँ, लेकिन किसी भी रचना की खूबियां ढूंढ कर, उसकी प्रशंसा में कोई कंजूसी भी नहीं करता।
अविनाश - प्रत्येक वर्ष दिल्ली जैसे शहरों में 'पुस्तक मेला' आयोजित हो रहा है। इस आयोजन से साहित्य, रचनाकार, पाठक तथा प्रकाशक, इनमें से किस की भलाई हो रही है?
रंजन - पुस्तक मेला का आयोजन सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, विश्व भर में होता है। यह एक व्यापारिक मेला है, जिसका एकमात्र उद्देश्य व्यापार है, और प्रकाशक इसे अपने व्यापार के लिए ही आयोजित करते हैं।
अविनाश - आदरणीय, आखिरी सवाल, जो मार्गदर्शन हेतु जानना चाहूँगा कि, आज कथा साहित्य की भीड़ में उन युवा लेखक और लेखिकाओं के लिए किस प्रकार संदेश देना चाहेंगे कि, भीड़ से अलग अपनी पहचान कृति के माध्यम से बना सके? और इस भीड़ में आपकी निगाहें कहाँ ठहर रही हैं, जिनसे उम्मीद की जा सके?
रंजन - हिंदी कथा लेखन में आज की पीढ़ी, एक नई वाली हिंदी की खुशबू के साथ आई है, और खुशी की बात यह है कि महिला कथा लेखन भी, पुरुषों के साथ-साथ अपनी पहचान बना रही है। इनकी भाषा भी नई है, और शिल्प भी अपना है।
भाषा के प्रति पारंपरिक मान्यता के अनुसार बोलने और लिखने की भाषा अलग-अलग होती थी। लेखन की भाषा, बोल-चाल की भाषा से परिष्कृत हुआ करती थी। हम जिस भाषा में बोलते थे, उस भाषा में लिखते नहीं थे, लेकिन आज की पीढ़ी ने, इस परिपाटी को छोड़ दिया है। इसलिए उनके लेखन की भाषा सरल हो गई है, उसमें स्वाभाविक प्रवाह आ गया है और वह नैसर्गिक हो गई है। कहा जा सकता है कि इस पीढ़ी की भाषा भी अपने कथ्य की तरह यथार्थवादी हो गई है।
कथा साहित्य में कदम रखने वाले नए लेखक/लेखिकाओं से मुझे यही कहना है कि वे अपनी भाषा को तत्सम-निष्ठ हिंदी से बचाकर, हिंदुस्तानी हिंदी में लिखें, जिस जुबान में हम बातचीत करते हैं, उसी जुबान में लिखें।
यदि आप अपनी पाठकीयता को बचाए रखना चाहते हैं तो कहानियों को अपने विचारों के बोझ से बोझिल ना होने दें। कथानक में उत्सुकता बनाए रखें, और संवेदना के रस में डूबी किस्सागोई होती रहे, फिर और कुछ नहीं चाहिए।
आप की कहानी की पहली पंक्ति इतनी चुंबकीय हो कि पाठक को खींच ले... और अंतिम पंक्ति ऐसी हो, जिस पर आह! या वाह! निकल जाए।
दिल से लिखिए, डूब कर लिखिए। अपनी भावनाओं में बहते हुए लिखिए, ताकि आपका पाठक भी उसे इन्हीं भावनाओं में डूब कर पढ़े। और अंतिम बात, दिल से लिखी पंक्तियों को बाद में दिमाग से मत बदलिए... याद रखिए, लेखन का मुख्य तत्व हृदय है, जबकि आलोचना का मुख्य तत्व बुद्धि होती है। लेखन में बुद्धि नहीं हृदय का इस्तेमाल कीजिए, बुद्धि का उपयोग आलोचना के लिए छोड़ दीजिए।
मेरी निगाहें किसी एक पर नहीं, आप सब पर ठहरी हुई है, इन निगाहों में आशा है, उम्मीद है... और मैं आप सभी के साथ हूँ। आपको जब भी मेरी जरूरत पड़े, मैं आप सबके साथ हूँ।
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