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कृति - *कल, किसने देखा* (कहानी संग्रह) कृतिकार - संजय कुमार 'अविनाश' प्रकाशन वर्ष - २०१८ई. मूल्य - १२०रूपये प्रकाशक - नव-सृजन, लखीसराय, बिहार समीक्षक- प्रो. शरद नारायण खरे *समकालीन चेतना से ओतप्रोत: "कल, किसने देखा"* कहानियाँ सदैव हमें उद्वेलित करती हैं। कहानियों की विषयवस्तु हमारे जीवन के आसपास की होती है। इसलिए कहानियाँ अपनेपन का अहसास कराती हैं। वस्तुतः कहानियाँ अपनी गतिशीलता व संप्रेषणीयता से पाठक से न केवल प्रत्यक्ष संवाद करती हैं, बल्कि पाठक के मन मस्तिष्क पर प्रहार भी करती हैं और उसके विचारों को भी नव आयाम देती हैं, पर आवश्यक यही है कि कहानीकार समाज को भलीभांति समझने-बूझने व परखने में तीक्ष्ण हो। यदि ऐसा है तो वह अपने नजरिये को पैना रखकर समाज से जुड़ी श्रेष्ठ कहानियों का सृजन कर, साहित्य के कोश को समृद्ध करने में महती भूमिका का निर्वहन कर सकने में निश्चित रूप से सफल हो सकता है। संजय कुमार 'अविनाश' इसी श्रेणी के सफल कहानीकार हैं। उनकी इस संग्रह "कल, किसने देखा" की छोटी-छोटी, पर अत्यंत सार्थक व प्रभावशाली कहानियों में वह विशिष्टता है कि उन्हें पढ़कर उसकी आँखें सजल हो जाती हैं। १६०पृष्ठीय कृति में कुल १३कहानियाँ हैं। अविनाश जी बिहार के हैं। वे आंचलिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी कहानियों में बिहार के भाषायी तेवर और वहां की मिट्टी की गंध है। जिसका हर पाठक अनुभूति कर सकता है। आंचलिकता का वास्तविक बोध तभी होता है जब अंचल की भाषा के साथ ही वहां की खूशबू, संस्कृति व जीवनशैली का बोध होता है। कहानियों में किसान की चिंता है, उसका शोषण व अंतहीन सुख है। कहीं सामाजिक विडंबनाएं हैं, तो कहीं विसंगतियां हैं। कहीं पतन है, कहीं अमानुषिकता, कहीं त्रासदियां, तो कहीं प्रेम के साथ सम्बद्ध कटु यथार्थ है। पर हर कहानी में कुछ न कुछ खास अवश्य है। विषयों में नयापन भी है, और प्रस्तुति में अनूठापन है। कहीं आदर्श है तो कहीं व्यवहार। कहीं कल्पना है तो कहीं यथार्थ। वस्तुतः कहानियों में निश्चित रूप से एक ताजगी व मौलिकता विद्यमान है, इस यथार्थ से कदापि भी इंकार नहीं किया जा सकता। प्रायः हर कहानी में एक ऊर्जा है। कहीं दर्पण बनकर कहानी समाज के असली रूप को प्रस्तुत करती है, तो कहीं कोई कहानी समाज को दर्पण दिखाती है। कहीं सपाटबयानी है, तो कहीं आशाएं/आकाक्षाएं/प्रत्याशाएं व अपेक्षाएं हैं। पर कहानियों का ताना-बाना गहन बौद्धिक स्तर पर बुना-गुना गया है। इसीलिए कहानियों में ध्वनि व प्रतिध्वनि निहित है, जो स्पष्ट सुनाई देती है। मूलतः अविनाश जी उपन्यासकार हैं और इसके पूर्व तीन उपन्यासों की वे सृजन कर चुके हैं। वैसे भी एक अच्छा उपन्यासकार अच्छा कहानीकार होता है, और अच्छा कहानीकार अच्छा उपन्यासकार होता है, इस दृष्टि से अविनाश की कहानियाँ अत्यंत प्रभावशाली बन पड़ी है। कहानियों में चेतना है, ऊर्जा है, चिंतन है, रोचकता है, सार्थकता भी है। ये कहानियाँ नारी-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श से सम्बद्ध हैं, तो प्रेम, चेतना,.जीवन मूल्यों, आदर्शों, पतन, विसंगतियों, विद्रूपताओं व विडंबनाओं से भी सरोकार रखती हैं। दरअसल, तेरहवीं कहानी आनंद मुखर्जी द्वारा रचित है। कहानियों में एक समृद्धता निहित है, इस यथार्थ से कदापि भी इंकार नहीं किया जा सकता है। कहानी 'लूटन की मेहरारू' में कहानीकार ने एड्स की बीमारी के बहाने नारी-उपेक्षा पर व्यंग्य किया है। कहानी को वर्तमान से जोड़ने का अच्छा प्रयत्न हुआ है। "डरकडोर' कहानी एक विवाहित की पीड़ा की मार्मिक कहानी है। पुत्र-लालसा पर प्रहार करके एक अच्छा संदेश दिया गया है। कहानी 'परबतिया' विचित्र मानसिकता से उपजी है। एक पिता के द्वारा अपनी ही बेटी के साथ भोग-विलास की कहानी अजीबोगरीब है। आखिरकार बेटी निज अस्मत को बचाने में विफल होकर, मृत्यु को गले लगा देती है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं कि अविनाश जी मनोवैज्ञानिक विशिष्टता भी रखते हैं। यह विशिष्टता उनकी कहानियों में हमें स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। शीर्षक कथा 'कल, किसने देखा' दुर्लभ कहानी है। ऐसी कहानियाँ हिन्दी साहित्य में तो दृष्टिगोचर नहीं होती हैं। गांव के जमींदार पुत्र राहुल की कामना को कमला पूरा तो करती है, पर कमला की स्थिति को स्वप्न लीन बताकर कहानीकार उसके चरित्र को उज्जवल भी बनाता है। "अतीत एक स्मृति' जिसमें निर्धन, बेरोजगार किन्तु साहित्य प्रेमी युवक अमन का चित्रण एक ऐसे पात्र के रूप में हुआ है, जिसमें अतीत के गौरव और ऐतिहासिक संस्कृति के प्रति असीम लगाव है। आज आवश्यकता है निज संस्कृति को महत्व देने की। यह यथार्थ है कि अविनाश जी समकालीन चेतना से परिपूर्ण हैं, इसलिए उनकी कहानियाँ भी समकालीन दस्तावेज हैं। समय की शिला पर उकेरी गयीं ये कहानियाँ एक सशक्त सृजन बनकर ऊर्जा व नूतन संदेशों की न केवल प्रसारण करती हैं, बल्कि पाठक को बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश भी करती हैं। 'कटघरे', 'सत्तात्मक संक्रमण', 'चलती ट्रेन में दौड़ती औरत', 'कितनी औरतें चाहिए', 'फोनवाली' जैसी कहानियाँ भी पाठक को एक अलग ही संसार में ले जाकर खड़ी कर देती हैं, जहां चिंतन व नज़रिये को एक नयी दिशा मिलती है। अविनाश जी की कहानियों में व्यापक संभावनाएं विद्यमान है। सच है "कल, किसने देखा"। आगे आने वाला कल उन्हें एक प्रतिष्ठित कहानीकार के रूप में भी यश-कीर्ति प्रदान कर उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित कर सकता है। प्रो. शरद नारायण खरे विभागाध्यक्ष इतिहास शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय, मंडला (मध्यप्रदेश) ४८१६६१ मो. ९४२५४८४३८२